बदलाव जरूरी है?

आज हमस ब इस तरह का बरताव कर रहे हैं कि लगता है कि किसी प्रकार की नैतिकता की जरूरत ही नहीं रह गयी है। कहीं भी किसी प्रकार से हमारी कही सुनी जाय ऐसा ही प्रयास हो रहा है चाहे वह अनुचित ही क्यों न हो। क्या ऐसे होने से कहीं लाभ होगा। नहीं कभी नहीं। तो हम ऐसा क्यों कर रहे हैं। हमारे पास कहीं से भी लाभ आये यदि नहीं आता है तो हम उसके लिए उचित अनुचित कदम और कहने में नहीं हिचकते हैं। हमें इस पर जरूर विचार करना चाहिए।
चाहे देश में मारकाट मच जाय लाखेंा जिन्दगियां बेकार हो जाय। मां-बहिनों को अनाथ की जिन्दगी जीनी पड़े लड़के उचित व्यवस्था के बिना अस्वास्थ्य कर जीवन जीने को विवश हो जायं ।लेकिन हम अपनी आदत से बाज नहीं आ सकते हैं ऐसे में जनता के पास मूक दर्शक बने रहने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा है िकवह किसी प्रकार से इसका प्रतिकार करे। कभी -’कभी कोई महामानव आता है और राह दिखाने की कोशिश करता है लेकिन अधिकांश समय स्वार्थी तत्वों के द्वारा लाभ उठाया जाता रहा है और जनमानस इसी प्रकार की स्वार्थी चक्की में पिस जाने को बाध्य हो ता है।
किसी के बात का कोई लगाम ही नहीं है चाहे जो बक जाये वह उससे कोई यह पूछनें वाला नहीं कि तुमने इस प्रकार की बात क्यों की। लोग अनाप सनाप बकते रहते हैं परिणामतः जनता को अनेकों कष्टों से गुजरना पड़ता है। क्या हमारे अगुवा गण इस बारे में सोच ते हैं कि आप का व्यवहार क्या है। आपके साथ यदि इस प्रकार का व्यवहार किया जाय तो आप को कैसा लगेगा । इससे होने वाले नुकसान जिसे अनुदान या घाटा पूरा करने का नाम दिया जा रहा है। जनता से ही वसूला जायेगा और जनता को ही न ुकसान उठाना पड़ रहा है। इसलिए जनता को ही समझाने कीआवश्यकता है कि तुम ठीक से कानून का पालन करो और सुखी रहो। इस काम में केन्द्रीय, प्रान्तीय, स्थानीय नेताओं के द्वारा हुए प्रयास काम हो सकते हैं लेकिन प्रश्न उठता है कि अपने स्वार्थो से उपर उठ कर कौन त्यागी है जो यह बीड़ा उठाये और जनता को उसके अधिकारों और कर्तव्यों की याद दिलाये।
जनता के बीच से जाने वाले लोगों को जब शक्ति प्राप्त हो जाती है तो उसका दुरूपयोग होने लगता है और प्रभुता पाई काही मद नाहीं की हालत पैदा हो जाती है । जनमानस के बीच यह मशहूर है कि नेताजी चुनाव के बाद फिर चुनाव के समय ही दिखेंगे। इस परिपाटी को तोड़े बिना जनता का भला होने वाला नहीं। जनता के आंखों से आंसू पोछने का काम तो कोई जय प्रकाश ही कर सकता है जो शासक बन कर नहीं बल्कि सेवक बन समाज को समग्र क्रांति की तरफ ले जा सकता है। अन्ना हजारे हो सकते हैं जो भ्रष्टाचार मु क्त भारत के लिए आमरण अनशन करने पर उतारू हो गये थे। आज जनता के सामने कोई ऐसा पुरूष आवे तो जनमानस उसे सहर्ष अपनाने को व्यग्र है समय-समय पर जनता ने अपनी इच्छाओं को जाहिर भी किया है चाहे वह प्रान्तीय सरकारों के परिवर्तन से या केन्द्रीय सरकार में बदलाव लाकर। क्या कोई बदलावी(क्रांतिकारी)सामने आने वाला है ,?

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s